भारत की राजधानी दिल्ली में हुए सांप्रदायिक हिंसा ने एक बार फिर ज़ाहिर किया है कि किसी भी हिंसा में सबसे ज़्यादा प्रभावित महिलाएं और बच्चे होते हैं. बीबीसी संवाददाता गीता पांडे की रिपोर्ट.
उत्तरी पूर्वी दिल्ली में भड़की हिंसा में कम से कम 40 लोगों की मौत हुई है, इनमें हिंदू और मुसलमान दोनों शामिल हैं. हिंसा के बाद हज़ारों मुस्लिम महिलाएं और बच्चे बेघर हो चुके हैं, उनके सामने भविष्य की अनिश्चितताएं हैं.
इंदिरा विहार के एक बड़े भीड़ वाले हॉल में, दंगों से बेघर हुई महिलाएं और बच्चे दरी और मैट पर बैठ हुए हैं. इनमें कई युवा महिलाएं हैं जिनके गोद में रोते हुए बच्चे हैं. कुछ छोटे बच्चे भी हैं जिन्होंने अभी चलना सीखा ही है और कुछ थोड़े बड़े बच्चे भी, जो समूह में खेल रहे हैं.
यह हॉल एक मुस्लिम कारोबारी का है, जो अब एक तरह से विस्थापित लोगों की शरणस्थली बन चुका है.
यहां पहुंची महिलाएं एवं बच्चे दंगा करने पर उतारू हिंदू भीड़ के हमले के बाद शिव विहार के अपने अपने घरों से जान बचाकर भागे हुए हैं. शिव विहार दिल्ली में हुए दंगा में सबसे प्रभावित इलाकों में एक है.
शिव विहार मुख्य रूप से कामकाजी हिंदुओं की बहुलता वाला इलाका है लेकिन यहां मुस्लिमों की आबादी भी ठीकठाक है. यह एक गंदे नाले से सटी हुई संकीर्ण गलियों वाली बस्ती है. इस नाले के साथ कुछ सौ मीटर आगे की दूरी पर मुस्लिम बहुल आबादी वाले चमन पार्क और इंदिरा विहार का इलाका है.
हिंदू और मुस्लिम बहुलता वाले इलाके को केवल एक सड़क अलग करती है. ये लोग यहां दशकों से शांतिपूर्ण ढंग से साथ साथ रह रहे थे लेकिन अब सबकुछ बदल गया है.
नसरीन अंसारी भी शिव विहार के अपने घर से भाग कर आई हैं. वह बताती हैं कि मंगलवार की दोपहर से उनके लिए मुश्किल वक्त का दौर शुरू हुआ जब घर पर केवल महिलाएं थीं. तब घर के पुरुष दिल्ली के दूसरे छोर पर मुस्लिमों के धार्मिक उत्सव में हिस्सा लेने गए हुए थे.
नसरीन बताती हैं, "हम लोगों ने 50-60 लोगों को देखा. मैं नहीं जानती थी कि वे लोग कौन थे. हमने उन्हें पहले कभी नहीं देखा था. उन लोगों ने हमें कहा कि वे हमारी रक्षा के लिए आए हैं और कहा कि आप घरों में अंदर रहिए."
नसरीन और दूसरी महिलाओं ने अपने घरों की खिड़कियों और बालकनी से उन्हें देखना शुरू किया तो थोड़ी ही देर में उन्हें एहसास हो गया कि ये लोग उनकी सुरक्षा के लिए नहीं आए थे.
नसरीन ने एक वीडियो मुझे दिखाया जो उन्होंने खिड़की के अंदर से ही बनाया था. इसमें कुछ पुरुष हेलमेट पहने और लंबी लंबी लाठियां रखे हुए दिखाई पड़ते हैं.
नसरीन के मुताबिक़, ये पुरुष जय श्रीराम के नारे लगा रहे थे और हनुमान चालीसा का पाठ कर रहे थे.
उनकी मां नूर जहां अंसारी बताती हैं कि एक मुस्लिम पड़ोसी ने फोन करके बताया कि उनके घर में आग लगा दी गई.
नूर जहां अंसारी बताती हैं, "हमारी खिड़की से हम देख पा रहे थे कि एक मुस्लिम पड़ोसी का घर और उसकी दवा दुकान को आग लगा दी गई थी."
नूर जहां अंसारी के मुताबिक हमलावरों ने बिजली के ट्रांसफ़ॉर्मर को नष्ट कर दिया था, इसके बाद धुंए के चलते इलाके में अंधेरा सा हो गया.
नूर जहां अंसारी बताती हैं, "जल्दी ही, हमारे आस पड़ोस में आग ही आग दिखाई देने लगी. वे लोग पेट्रोल बम और कुकिंग गैस सिलेंडर से मुसलमानों के घर और उनकी दुकानों को निशाना बना रहे थे. हिंदुओं के घर को नुकसान नहीं पहुंचाया जा रहा था. हमलोगों ने कभी नहीं सोचा था कि हमारे साथ ऐसा होगा. हमारा कसूर यह है कि हमारा जन्म मुस्लिम परिवारों में हुआ."
नसरीन बताती हैं कि महिलाओं ने पुलिस को दर्जनों बार फ़ोन कॉल्स किए. "हर बार उन लोगों ने हमें भरोसा दिलाया कि पांच मिनट में हम पहुंच जाएंगे."
एक वक्त ऐसा भी आ गया जब नसरीन ने अपने रिश्तेदारों को फोन करके बताना शुरू कर दिया कि वे लोग इस रात नहीं बचेंगे.
इन लोगों को आखिरकार सुबह के तीन बजे वहां से निकाला गया, 12 घंटे के बाद. जब चमन पार्क और इंदिरा विहार के मुस्लिम पुरुषों के साथ पुलिस इलाक़े में पहुंची.
नसरीन बताती हैं, "हम लोग अपना जान बचाकर भागे. हमने अपना कपड़ा अपने साथ रख लिया. हमारे पास जूते चप्पल पहनने का वक्त भी नहीं मिला."
Tuesday, March 3, 2020
Tuesday, January 21, 2020
म्यांमार के रास्ते समंदर तक पहुंचा चीन, भारत को कितना ख़तरा?
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग शुक्रवार को म्यांमार की राजधानी नेपिडॉ पहुंचे. 19 साल बाद यह पहला मौक़ा है जब कोई चीनी राष्ट्रपति म्यांमार के दौरे पर है.
वैसे तो जिनपिंग दोनों देशों के राजनयिक रिश्तों की 70वीं वर्षगांठ पर म्यांमार आए हैं मगर इस यात्रा के दौरान वह म्यांमार की शीर्ष नेता आंग सान सू ची के साथ मिलकर चीन-म्यांमार आर्थिक गलियारे के तहत कई परियोजनाओं को शुरू करेंगे.
शी जिनपिंग के दौरे से पहले चीन के उप विदेश मंत्री लाउ शाहुई ने पत्रकारों से कहा था कि राष्ट्रपति की इस यात्रा का मक़सद दोनों देशों के रिश्तों को मज़बूत करना और बेल्ट एंड रोड अभियान के तहत आपसी सहयोग बढ़ाना है.
उन्होंने कहा था कि इस दौरे का तीसरा लक्ष्य है 'चीन-म्यांमार आर्थिक गलियारे को मूर्त रूप देना.' चीन म्यांमार आर्थिक गलियारा शी जिनपिंग के महत्वाकांक्षी बेल्ड एंड रोड अभियान का ही अंग है.
चीन के इसी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव को भारत सशंकित निगाहों से देखता रहा है क्योंकि उसका मानना है कि इस अभियान के तहत चीन दक्षिण एशियाई देशों में अपना प्रभाव और पहुंच बढ़ाने की कोशिशों में जुटा है.
दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के सेंटर फ़ॉर ईस्ट एशियन स्टडीज़ में असोसिएट प्रोफ़ेसर रितु अग्रवाल कहती हैं कि चीन और म्यांमार के बीच अच्छे संबंधों की शुरुआत काफ़ी पहले हो गई थी.
वह बताती हैं, "चीन और म्यांमार काफ़ी क़रीबी कारोबारी सहयोगी रहे हैं. चीन के युन्नात प्रांत में म्यामांर की सीमा के साथ 2010 से लेकर अब तक कई सारे बॉर्डर इकनॉमिक ज़ोन बनाए गए हैं और आर्थिक आधार पर म्यांमार को चीन से जोड़ने की कोशिश की जा रही है. जैसे कि यहां से ऑयल और गैस पाइपलाइन बिछाने की भी बात थी."
डॉक्टर रितु अग्रवाल बताती हैं कि युन्नान की प्रांतीय सरकार ने अपने स्तर पर म्यामांर के साथ अच्छे रिश्ते बनाने की कोशिश की थी. यह सिलसिला 80 के दशक से शुरू हुआ था. हालांकि, बीच में कई उतार-चढ़ाव आए. मगर अब बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के माध्यम से इस कोशिश को जारी रखा जा रहा है.
बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की विदेश नीति का अहम हिस्सा माना जाता है. इसे सिल्क रोड इकनॉमिक बेल्ट और 21वीं सदी का समुद्री सिल्क रोड भी कहा जाता है. जिनपिंग ने 2013 में इसे शुरू किया था.
बेल्ट रोड इनिशिएटिव के तहत चीन का इरादा कम से कम 70 देशों के माध्यम से सड़कों, रेल की पटरियों और समुद्री जहाज़ों के रास्तों का जाल सा बिछाकर चीन को मध्य एशिया, मध्य पूर्व और रूस होते हुए यूरोप से जोड़ने का है. चीन यह सब ट्रेड और निवेश के माध्यम से करना चाहता है.
चीन के इस बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव में भौगोलिक रूप से म्यांमार काफ़ी अहम है. म्यांमार ऐसी जगह पर स्थित है जो दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया के बीच है. यह चारों ओर से ज़मीन से घिरे चीन के युन्नान प्रांत और हिंद महासागर के बीच पड़ता है इसलिए चीन-म्यांमार इकनॉमिक कॉरिडोर की चीन के लिए बहुत अहमियत है.
डॉक्टर रितु अग्रवाल बताती हैं, "चीन काफ़ी सालों से कोशिश कर रहा है कि कैसे हिंद महासागर तक पहुंचे. शी जिनपिंग की ताज़ा यात्रा चीन की समुद्री शक्ति को बढ़ाने की कोशिश में है क्योंकि चीन का समुद्री शक्ति बढ़ाना शी जिनपिंग की प्राथमिकताओं में है. इसीलिए वह पोर्ट बनाने, रेलवे लाइन बिछाने की कोशिश कर रहे हैं. वह इनके माध्यम से कनेक्टिविटी चाहते हैं."
अप्रैल 2019 में हुए चीन के दूसरे बेल्ट एंड रोड फ़ोरम (बीआरएफ़) में म्यांमार की नेता आंग सान सू ची ने 'चीन-म्यांमार आर्थिक गलियारे (सीएमईसी) के तहत सहयोग बढ़ाने के लिए चीन के साथ तीन एमओयू पर हस्ताक्षर किए थे.
चीन-म्यांमार आर्थिक गलियारा अंग्रेज़ी के Y अक्षर के आकार का एक कॉरिडोर है. इसके तहत चीन विभिन्न परियोजनाओं के माध्यम से हिंद महासागर तक पहुंचकर म्यांमार के साथ आर्थिक सहयोग बढ़ाना चाहता है.
2019 से 2030 तक चलने वाले इस आर्थिक सहयोग के तहत दोनों देशों की सरकारों में इन्फ्रास्ट्रक्चर, उत्पादन, कृषि, यातायात, वित्त, मानव संसाधन विकास, शोध, तकनीक और दूरसंचार जैसे कई क्षेत्रों में कई सारी परियोजनाओं को लेकर सहयोग करने पर सहमति बनी थी.
इसके तहत चीन के युन्नान प्रांत की राजधानी कुनमिंग से म्यांमार के दो मुख्य आर्थिक केंद्रों को जोड़ने के लिए लगभग 1700 किलोमीटर लंबा कॉरिडोर बनाया जाना है.
कुनमिंग से आगे बढ़ने वाले इस प्रॉजेक्ट को पहले मध्य म्यांमार के मंडालय से हाई स्पीड ट्रेन से जोड़ा जाएगा. फिर यहां से इसे पूर्व में यंगॉन और पश्चिम में क्यॉकप्यू स्पेशल इकनॉमिक ज़ोन से जोड़ा जाएगा. चीन क्यॉकप्यू में पोर्ट भी बनाएगा.
इस अभियान के तहत म्यांमार की सरकार ने शान और कचिन राज्यों में तीन बॉर्डर इकनॉमिक कोऑपरेशन ज़ोन बनाने पर सहमति जताई थी.
चीन का कहना है कि सीएमईसी से म्यांमार के दक्षिण और पश्चिमी क्षेत्रों में सीधे चीनी सामान पहुंच सकेगा और चीनी उद्योग भी सस्ते श्रम की तलाश में ख़ुद को यहां शिफ़्ट कर सकते हैं. यह दावा किया जाता रहा है कि म्यांमार इस परियोजना के कारण चीन, दक्षिणपूर्व एशिया और दक्षिण एशिया के बीच कारोबार का केंद्र बन जाएगा.
लेकिन चीन और म्यांमार के बीच युन्नान के साथ लगती सीमा पर कई तरह की पहलों के चलते बने संबंध पूरी तरह आर्थिक संबंध ही हैं, ऐसा भी नहीं है. डॉक्टर रितु अग्रवाल कहती हैं कि इस तरह के आर्थिक अभियानों के पीछे कहीं न कहीं सुरक्षा का एजेंडा रहता है.
भारत के लिहाज़ से देखें तो चीन-म्यांमार आर्थिक गलियारे को कुछ विश्लेषक चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे की तरह मान रहे हैं जो चीन के पश्चिमी शिनज़ियांग प्रांत को कराची और फिर अरब सागर में ग्वादर बंदरगाह से जोड़ता है. वैसे ही चीन-म्यांमार आर्थिक गलियारा चीन को बंगाल की खाड़ी की ओर से समंदर से जोड़ता है.
इसके अलावा, पिछले साल शी जिनपिंग ने नेपाल यात्रा के दौरान चीन-नेपाल आर्थिक गलियारे की शुरुआत की थी. इसके तहत चीन का इरादा तिब्बत को नेपाल से जोड़ना है. चीन नेपाल कॉरिडोर, चीन-पाकिस्तान और चीन-म्यांमार गलियारों के बीच में पड़ता है.
इस तरह तीनों गलियारे का चीन को कारोबारी स्तर पर लाभ होगा मगर भारत की चिंताएं सुरक्षा को लेकर भी रहती हैं. दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के सेंटर फ़ॉर ईस्ट एशियन स्टडीज़ में असोसिएट प्रोफ़ेसर रितु अग्रवाल कहती हैं भारत को पहले से ही इस बात की चिंता है कि कनेक्टिविटी बढ़ने के साथ सुरक्षा को लेकर भी ख़तरा बढ़ सकता है.
वह कहती हैं, "चीन जो भी कनेक्टिविटी करता है, उसमें वह इकनॉमिक कॉरिडोर की बात करता है मगर उसके पीछे भी दूसरों की अर्थव्यवस्था को कंट्रोल करने जैसी रणनीतियां रहती हैं. यह चीन का तरीक़ा है. भारत के लिए चिंता की बात यह है कि दक्षिण एशिया में उसके पड़ोसी अगर चीन के नियंत्रण में आ गए तो उसे क्षेत्रीय शक्ति के रूप में उभरने में दिक्कत होगी."
चीन ने भारत को भी अपने इस अभियान में शामिल करने की कोशिशें की हैं मगर भारत ने दिलचस्पी नहीं दिखाई. हालांकि, चीन मामलों के जानकार अतुल भारद्वाज मानते हैं कि चीन की पहुंच म्यांमार कॉरिडोर के माध्यम से हिंद महासागर तक हो जाने से भारत को कोई चिंता नहीं होनी चाहिए.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "भारत हमेशा से क्षेत्रीय कनेक्टिविटी बढ़ाए जाने के समर्थन में रहा है इसलिए उसे किस बात का डर होगा? बल्कि उसे तो अपने आसपास शुरू होने वाली नई परियोजनाओं में आर्थिक अवसरों की तलाश करनी चाहिए. ऐसा नहीं है कि चीन उन हिस्सों को जोड़ रहा है जो अछूते रहे हैं. वह सिर्फ़ कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए वैकल्पिक रास्ते मुहैया करवा रहा है."
वैसे तो जिनपिंग दोनों देशों के राजनयिक रिश्तों की 70वीं वर्षगांठ पर म्यांमार आए हैं मगर इस यात्रा के दौरान वह म्यांमार की शीर्ष नेता आंग सान सू ची के साथ मिलकर चीन-म्यांमार आर्थिक गलियारे के तहत कई परियोजनाओं को शुरू करेंगे.
शी जिनपिंग के दौरे से पहले चीन के उप विदेश मंत्री लाउ शाहुई ने पत्रकारों से कहा था कि राष्ट्रपति की इस यात्रा का मक़सद दोनों देशों के रिश्तों को मज़बूत करना और बेल्ट एंड रोड अभियान के तहत आपसी सहयोग बढ़ाना है.
उन्होंने कहा था कि इस दौरे का तीसरा लक्ष्य है 'चीन-म्यांमार आर्थिक गलियारे को मूर्त रूप देना.' चीन म्यांमार आर्थिक गलियारा शी जिनपिंग के महत्वाकांक्षी बेल्ड एंड रोड अभियान का ही अंग है.
चीन के इसी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव को भारत सशंकित निगाहों से देखता रहा है क्योंकि उसका मानना है कि इस अभियान के तहत चीन दक्षिण एशियाई देशों में अपना प्रभाव और पहुंच बढ़ाने की कोशिशों में जुटा है.
दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के सेंटर फ़ॉर ईस्ट एशियन स्टडीज़ में असोसिएट प्रोफ़ेसर रितु अग्रवाल कहती हैं कि चीन और म्यांमार के बीच अच्छे संबंधों की शुरुआत काफ़ी पहले हो गई थी.
वह बताती हैं, "चीन और म्यांमार काफ़ी क़रीबी कारोबारी सहयोगी रहे हैं. चीन के युन्नात प्रांत में म्यामांर की सीमा के साथ 2010 से लेकर अब तक कई सारे बॉर्डर इकनॉमिक ज़ोन बनाए गए हैं और आर्थिक आधार पर म्यांमार को चीन से जोड़ने की कोशिश की जा रही है. जैसे कि यहां से ऑयल और गैस पाइपलाइन बिछाने की भी बात थी."
डॉक्टर रितु अग्रवाल बताती हैं कि युन्नान की प्रांतीय सरकार ने अपने स्तर पर म्यामांर के साथ अच्छे रिश्ते बनाने की कोशिश की थी. यह सिलसिला 80 के दशक से शुरू हुआ था. हालांकि, बीच में कई उतार-चढ़ाव आए. मगर अब बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के माध्यम से इस कोशिश को जारी रखा जा रहा है.
बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की विदेश नीति का अहम हिस्सा माना जाता है. इसे सिल्क रोड इकनॉमिक बेल्ट और 21वीं सदी का समुद्री सिल्क रोड भी कहा जाता है. जिनपिंग ने 2013 में इसे शुरू किया था.
बेल्ट रोड इनिशिएटिव के तहत चीन का इरादा कम से कम 70 देशों के माध्यम से सड़कों, रेल की पटरियों और समुद्री जहाज़ों के रास्तों का जाल सा बिछाकर चीन को मध्य एशिया, मध्य पूर्व और रूस होते हुए यूरोप से जोड़ने का है. चीन यह सब ट्रेड और निवेश के माध्यम से करना चाहता है.
चीन के इस बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव में भौगोलिक रूप से म्यांमार काफ़ी अहम है. म्यांमार ऐसी जगह पर स्थित है जो दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया के बीच है. यह चारों ओर से ज़मीन से घिरे चीन के युन्नान प्रांत और हिंद महासागर के बीच पड़ता है इसलिए चीन-म्यांमार इकनॉमिक कॉरिडोर की चीन के लिए बहुत अहमियत है.
डॉक्टर रितु अग्रवाल बताती हैं, "चीन काफ़ी सालों से कोशिश कर रहा है कि कैसे हिंद महासागर तक पहुंचे. शी जिनपिंग की ताज़ा यात्रा चीन की समुद्री शक्ति को बढ़ाने की कोशिश में है क्योंकि चीन का समुद्री शक्ति बढ़ाना शी जिनपिंग की प्राथमिकताओं में है. इसीलिए वह पोर्ट बनाने, रेलवे लाइन बिछाने की कोशिश कर रहे हैं. वह इनके माध्यम से कनेक्टिविटी चाहते हैं."
अप्रैल 2019 में हुए चीन के दूसरे बेल्ट एंड रोड फ़ोरम (बीआरएफ़) में म्यांमार की नेता आंग सान सू ची ने 'चीन-म्यांमार आर्थिक गलियारे (सीएमईसी) के तहत सहयोग बढ़ाने के लिए चीन के साथ तीन एमओयू पर हस्ताक्षर किए थे.
चीन-म्यांमार आर्थिक गलियारा अंग्रेज़ी के Y अक्षर के आकार का एक कॉरिडोर है. इसके तहत चीन विभिन्न परियोजनाओं के माध्यम से हिंद महासागर तक पहुंचकर म्यांमार के साथ आर्थिक सहयोग बढ़ाना चाहता है.
2019 से 2030 तक चलने वाले इस आर्थिक सहयोग के तहत दोनों देशों की सरकारों में इन्फ्रास्ट्रक्चर, उत्पादन, कृषि, यातायात, वित्त, मानव संसाधन विकास, शोध, तकनीक और दूरसंचार जैसे कई क्षेत्रों में कई सारी परियोजनाओं को लेकर सहयोग करने पर सहमति बनी थी.
इसके तहत चीन के युन्नान प्रांत की राजधानी कुनमिंग से म्यांमार के दो मुख्य आर्थिक केंद्रों को जोड़ने के लिए लगभग 1700 किलोमीटर लंबा कॉरिडोर बनाया जाना है.
कुनमिंग से आगे बढ़ने वाले इस प्रॉजेक्ट को पहले मध्य म्यांमार के मंडालय से हाई स्पीड ट्रेन से जोड़ा जाएगा. फिर यहां से इसे पूर्व में यंगॉन और पश्चिम में क्यॉकप्यू स्पेशल इकनॉमिक ज़ोन से जोड़ा जाएगा. चीन क्यॉकप्यू में पोर्ट भी बनाएगा.
इस अभियान के तहत म्यांमार की सरकार ने शान और कचिन राज्यों में तीन बॉर्डर इकनॉमिक कोऑपरेशन ज़ोन बनाने पर सहमति जताई थी.
चीन का कहना है कि सीएमईसी से म्यांमार के दक्षिण और पश्चिमी क्षेत्रों में सीधे चीनी सामान पहुंच सकेगा और चीनी उद्योग भी सस्ते श्रम की तलाश में ख़ुद को यहां शिफ़्ट कर सकते हैं. यह दावा किया जाता रहा है कि म्यांमार इस परियोजना के कारण चीन, दक्षिणपूर्व एशिया और दक्षिण एशिया के बीच कारोबार का केंद्र बन जाएगा.
लेकिन चीन और म्यांमार के बीच युन्नान के साथ लगती सीमा पर कई तरह की पहलों के चलते बने संबंध पूरी तरह आर्थिक संबंध ही हैं, ऐसा भी नहीं है. डॉक्टर रितु अग्रवाल कहती हैं कि इस तरह के आर्थिक अभियानों के पीछे कहीं न कहीं सुरक्षा का एजेंडा रहता है.
भारत के लिहाज़ से देखें तो चीन-म्यांमार आर्थिक गलियारे को कुछ विश्लेषक चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे की तरह मान रहे हैं जो चीन के पश्चिमी शिनज़ियांग प्रांत को कराची और फिर अरब सागर में ग्वादर बंदरगाह से जोड़ता है. वैसे ही चीन-म्यांमार आर्थिक गलियारा चीन को बंगाल की खाड़ी की ओर से समंदर से जोड़ता है.
इसके अलावा, पिछले साल शी जिनपिंग ने नेपाल यात्रा के दौरान चीन-नेपाल आर्थिक गलियारे की शुरुआत की थी. इसके तहत चीन का इरादा तिब्बत को नेपाल से जोड़ना है. चीन नेपाल कॉरिडोर, चीन-पाकिस्तान और चीन-म्यांमार गलियारों के बीच में पड़ता है.
इस तरह तीनों गलियारे का चीन को कारोबारी स्तर पर लाभ होगा मगर भारत की चिंताएं सुरक्षा को लेकर भी रहती हैं. दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के सेंटर फ़ॉर ईस्ट एशियन स्टडीज़ में असोसिएट प्रोफ़ेसर रितु अग्रवाल कहती हैं भारत को पहले से ही इस बात की चिंता है कि कनेक्टिविटी बढ़ने के साथ सुरक्षा को लेकर भी ख़तरा बढ़ सकता है.
वह कहती हैं, "चीन जो भी कनेक्टिविटी करता है, उसमें वह इकनॉमिक कॉरिडोर की बात करता है मगर उसके पीछे भी दूसरों की अर्थव्यवस्था को कंट्रोल करने जैसी रणनीतियां रहती हैं. यह चीन का तरीक़ा है. भारत के लिए चिंता की बात यह है कि दक्षिण एशिया में उसके पड़ोसी अगर चीन के नियंत्रण में आ गए तो उसे क्षेत्रीय शक्ति के रूप में उभरने में दिक्कत होगी."
चीन ने भारत को भी अपने इस अभियान में शामिल करने की कोशिशें की हैं मगर भारत ने दिलचस्पी नहीं दिखाई. हालांकि, चीन मामलों के जानकार अतुल भारद्वाज मानते हैं कि चीन की पहुंच म्यांमार कॉरिडोर के माध्यम से हिंद महासागर तक हो जाने से भारत को कोई चिंता नहीं होनी चाहिए.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "भारत हमेशा से क्षेत्रीय कनेक्टिविटी बढ़ाए जाने के समर्थन में रहा है इसलिए उसे किस बात का डर होगा? बल्कि उसे तो अपने आसपास शुरू होने वाली नई परियोजनाओं में आर्थिक अवसरों की तलाश करनी चाहिए. ऐसा नहीं है कि चीन उन हिस्सों को जोड़ रहा है जो अछूते रहे हैं. वह सिर्फ़ कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए वैकल्पिक रास्ते मुहैया करवा रहा है."
Monday, January 13, 2020
भारतीय सेना में अफ़सरों की कमी कितनी बड़ी चुनौती?
भारत के नए सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने पद ग्रहण करने के बाद अपनी पहली प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कहा कि 'भारतीय फ़ौज में अफ़सरों की कमी बरक़रार है'.
उन्होंने कहा कि 'भारतीय सेना में अफ़सरों की कमी इसलिए नहीं है कि लोग आवेदन नहीं कर रहे हैं, बल्कि इसलिए है कि सेना ने अफ़सर चुनने के अपने मानकों को अब तक नीचे नहीं किया है.'
समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार नरवणे ने कहा कि 'वे भारतीय फ़ौज में संख्या से ज़्यादा गुणवत्ता को अहमियत देंगे'.
भारतीय सेना प्रमुख के इस बयान की सोशल मीडिया पर काफ़ी चर्चा हुई और कई रिटायर्ड सैन्य अफ़सरों ने उनके इस बयान की प्रशंसा की है.
अगस्त 2018 में प्रेस सूचना विभाग ने भारतीय रक्षा मंत्रालय के हवाले से बताया था कि 1 जनवरी 2018 तक भारतीय सेना के पास 42 हज़ार से अधिक अफ़सर थे और 7298 सैन्य अफ़सरों की कमी थी.
इसके एक साल बाद समाचार एजेंसी पीटीआई ने बताया कि यह संख्या बढ़कर 7399 हो गई है. यानी भारतीय फ़ौज में लेफ़्टिनेंट या उससे ऊपर के पद के जितने अफ़सरों की ज़रूरत है, उसमें 100 अधिकारी और कम हो गए हैं.
भारतीय नौसेना और वायुसेना में भी अफ़सरों की कमी है. पर थल सेना में अफ़सरों की कमी उनसे कई गुना ज़्यादा है.
भारतीय सेना में अफ़सर लेवल पर एंट्री पाने में असफल रहे अभ्यर्थी बताते हैं कि 'जब एसएसबी (सर्विस सलेक्शन बोर्ड) द्वारा रिज़ल्ट की घोषणा की जाती है तो उनका मनोबल बनाये रखने के लिए बोर्ड के सदस्य कहते हैं कि अमिताभ बच्चन, राहुल द्रविड और पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने भी यह परीक्षा दी थी, पर वे इसे नहीं क्लियर कर पाए, इसलिए दिल छोटा ना करें.'
बताया जाता है कि एसएसबी हर अभ्यर्थी के अकादमिक रिकॉर्ड के अलावा उसकी लेखन क्षमता, डिबेट करने के तरीक़े, टीम में काम करने की क्षमता, तार्किक क्षमता और फ़ैसले लेने की क्षमता को परखता है.
बोर्ड के अनुसार हर अभ्यर्थी का मूल्यांकन OLQ (Officer Like Qualities) के मापदण्ड पर किया जाता है. यानी एक अभ्यर्थी में सैन्य अफ़सर बनने की ख़ूबियाँ हैं या नहीं, चयन प्रक्रिया में इसका ख़ास ध्यान रखा जाता है.
भारतीय सेना के रिटायर्ड अधिकारी और कारगिल युद्ध के 'हीरो' कहे जाने वाले मेजर डीपी सिंह ने सेना प्रमुख के बयान के बाद ट्वीट किया कि "SSB में अधिकतम अभ्यर्थी इसलिए सफल नहीं हो पाते क्योंकि उनमें 'ज़िम्मेदारी की भावना' का अभाव है."
तो क्या ये कहा जाए कि भारत में सेना के लिए क़ाबिल लोगों की संख्या घट गई है? या इसके पीछे वजह कुछ और है?
साथ ही सवाल ये भी है कि सेना में अफ़सरों की कमी की वजह से ग्राउंड पर तैनात सैन्य अधिकारियों में काम का कितना अतिरिक्त दबाव है? सेना के परिचालन में यह कितनी बड़ी चुनौती है? और किन वजहों से भारतीय सेना में अफ़सरों की कमी को पूरा नहीं किया जा सका है?
इन सवालों के जवाब जानने के लिए हमने 1971 से लेकर 90 के दशक तक भारतीय फ़ौज की कई महत्वपूर्ण सैन्य कार्रवाईयों का नेतृत्व करने वाले पूर्व लेफ़्टिनेंट जनरल शंकर प्रसाद और सैन्य रणनीति के जानकार-वरिष्ठ पत्रकार अजय शुक्ला से बात की. पढ़ें इन दोनों जानकारों का नज़रिया:
सेना के तीनों अंगों को मिलाकर भारत के पास क़रीब 14 लाख सैनिक हैं जो मुख्यत: उत्तर-पश्चिम में पाकिस्तान और पूर्वोत्तर में चीन से लगे बॉर्डर पर तैनात हैं.
फ़ौज में अफ़सरों की कमी की जो बात है, उस पर अब नहीं, बल्कि एक दशक से अधिक समय से चर्चा हो रही है.
ये कमी जूनियर अफ़सरों के स्तर पर है, जैसे लेफ़्टिनेंट, कैप्टन और मेजर. यही वो पद हैं जो भारतीय फ़ौज में 'फ़्रंट लाइन' की ताक़त कहे जाते हैं और किसी भी युद्ध के दौरान मोर्चा संभालते हैं.
ये वे अफ़सर होते हैं जो मैदाने-जंग में प्लाटून या कंपनी को लीड करते हैं. ये ना हों तो बड़े सैन्य अधिकारियों को जेसीओ रैंक के अफ़सरों को कमान सौंपनी पड़ती है जिसके उतने बढ़िया नतीजे नहीं निकलते.
अब बात अफ़सरों की कमी से होने वाले असर की, तो मानिए एक बटालियन में 20 अफ़सर अधिकृत हैं और सर्विस में सिर्फ़ 13 या 15 अफ़सर रह जाते हैं तो उन्हें काम 20 अफ़सरों का ही करना होता है.
उदाहरण के लिए, कश्मीर, सियाचीन और पूर्वोत्तर भारत के तनावपूर्ण इलाक़ों में एक सैन्य अफ़सर के बिना रात की पेट्रोलिंग नहीं होती. नियम है कि उसे एक अफ़सर ही लीड करेगा. अब उसे एक ऐसे अफ़सर की ड्यूटी भी करनी है जो उनकी बटालियन में कम है.
तो इस अतिरिक्त काम का असर ये होता है कि एक अफ़सर जो 30 दिन में से पंद्रह दिन रात को अपने बिस्तर पर सो सकता था, वो सिर्फ़ सात या दस दिन ही सो पाता है. इससे उन पर मानसिक और शारीरिक तनाव पड़ता है.
सेना प्रमुख ने यह बिल्कुल सही कहा कि अफ़सर के चयन का स्टैंडर्ड नहीं घटा सकते.
सेना से जुड़ा कोई भी शख़्स इस बात से सहमत होगा कि अगर चयन का मानदण्ड गिराया गया तो निचले स्तर पर सेना का नेतृत्व बहुत कमज़ोर हो जाएगा और उसके फ़ैसलों से सेना की बदनामी होगी, देश की बदनामी होगी.
इसलिए बेहतरीन लोगों को चुनने के लिए अगर ये कमी बनी भी रहे, तो चिंता की बात नहीं है. पर क्या अच्छे लोगों की कमी है? ऐसा बिल्कुल नहीं है. देश में बहुत शार्प लड़के हैं जो फ़ौज के लिए परफ़ेक्ट हैं.
असल बात ये है कि जो अच्छे लड़के हैं, वो फ़ौज में आना ही नहीं चाह रहे. वे आईआईएम में जा रहे हैं, अन्य प्रोफ़ेशनल कोर्स कर रहे हैं. और इसकी कुछ वजहें हैं.
सबसे बड़ी वजह है कि फ़ौज की नौकरी में शारीरिक परिश्रम बहुत है. दूसरी बड़ी वजह ये है कि फ़ौज की नौकरी से जुड़ा स्टेटस दिन प्रतिदिन कम हो रहा है, सुविधाएं और सैलरी कम रह गई हैं.
फ़ौज के लोग 25 साल से चिल्ला रहे हैं कि पे-कमिशन में सशस्त्र बलों का भी एक एक्टिव सदस्य होना चाहिए, लेकिन वे रखते ही नहीं हैं.
क्लास-वन सेवाओं में सबसे कम वेतन पाने वाली नौकरी आर्मी की है. प्रमोशन होने की संभावनाएं फ़ौज में सबसे कम होती हैं क्योंकि हमारे पदों का ढाँचा बड़ा अलग है.
सिविल सर्विस में तक़रीबन सभी जॉइंट सेक्रेट्री या एडिश्नल सेक्रेट्री तो कम से कम बन ही जाते हैं. पर आर्मी में 80-90 परसेंट लोग मेजर या लेफ़्टिनेंट कर्नल के पद तक पहुँचकर ही रिटायर हो जाते हैं.
भारत में अगर क्लास-ए की 10-12 सेवाएं हैं, तो सेना में अफ़सर होना उनमें सबसे अंत में आता है.
भौतिकतावादी ज़माना है, बच्चे बहुत होशियार हो गए हैं, सब यह देखते हैं कि इतनी मेहनत और वक़्त देने के बदले उन्हें क्या मिलेगा?
पहले 80-90 फ़ीसद बच्चे, जो एनडीए जाते थे, वे अच्छे पब्लिक स्कूलों से होते थे. पर अब वो बात नहीं रही.
आज़ाद भारत में, जब तक ब्रिटिश शासन था, फ़ौज के अफ़सर को आईसीएस (इंडियन सिविल सर्विस) वालों से 10 फ़ीसद अधिक पैसा मिलता था. तब बड़े-बड़े लोग फ़ौज में जाते थे.
उन्होंने कहा कि 'भारतीय सेना में अफ़सरों की कमी इसलिए नहीं है कि लोग आवेदन नहीं कर रहे हैं, बल्कि इसलिए है कि सेना ने अफ़सर चुनने के अपने मानकों को अब तक नीचे नहीं किया है.'
समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार नरवणे ने कहा कि 'वे भारतीय फ़ौज में संख्या से ज़्यादा गुणवत्ता को अहमियत देंगे'.
भारतीय सेना प्रमुख के इस बयान की सोशल मीडिया पर काफ़ी चर्चा हुई और कई रिटायर्ड सैन्य अफ़सरों ने उनके इस बयान की प्रशंसा की है.
अगस्त 2018 में प्रेस सूचना विभाग ने भारतीय रक्षा मंत्रालय के हवाले से बताया था कि 1 जनवरी 2018 तक भारतीय सेना के पास 42 हज़ार से अधिक अफ़सर थे और 7298 सैन्य अफ़सरों की कमी थी.
इसके एक साल बाद समाचार एजेंसी पीटीआई ने बताया कि यह संख्या बढ़कर 7399 हो गई है. यानी भारतीय फ़ौज में लेफ़्टिनेंट या उससे ऊपर के पद के जितने अफ़सरों की ज़रूरत है, उसमें 100 अधिकारी और कम हो गए हैं.
भारतीय नौसेना और वायुसेना में भी अफ़सरों की कमी है. पर थल सेना में अफ़सरों की कमी उनसे कई गुना ज़्यादा है.
भारतीय सेना में अफ़सर लेवल पर एंट्री पाने में असफल रहे अभ्यर्थी बताते हैं कि 'जब एसएसबी (सर्विस सलेक्शन बोर्ड) द्वारा रिज़ल्ट की घोषणा की जाती है तो उनका मनोबल बनाये रखने के लिए बोर्ड के सदस्य कहते हैं कि अमिताभ बच्चन, राहुल द्रविड और पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने भी यह परीक्षा दी थी, पर वे इसे नहीं क्लियर कर पाए, इसलिए दिल छोटा ना करें.'
बताया जाता है कि एसएसबी हर अभ्यर्थी के अकादमिक रिकॉर्ड के अलावा उसकी लेखन क्षमता, डिबेट करने के तरीक़े, टीम में काम करने की क्षमता, तार्किक क्षमता और फ़ैसले लेने की क्षमता को परखता है.
बोर्ड के अनुसार हर अभ्यर्थी का मूल्यांकन OLQ (Officer Like Qualities) के मापदण्ड पर किया जाता है. यानी एक अभ्यर्थी में सैन्य अफ़सर बनने की ख़ूबियाँ हैं या नहीं, चयन प्रक्रिया में इसका ख़ास ध्यान रखा जाता है.
भारतीय सेना के रिटायर्ड अधिकारी और कारगिल युद्ध के 'हीरो' कहे जाने वाले मेजर डीपी सिंह ने सेना प्रमुख के बयान के बाद ट्वीट किया कि "SSB में अधिकतम अभ्यर्थी इसलिए सफल नहीं हो पाते क्योंकि उनमें 'ज़िम्मेदारी की भावना' का अभाव है."
तो क्या ये कहा जाए कि भारत में सेना के लिए क़ाबिल लोगों की संख्या घट गई है? या इसके पीछे वजह कुछ और है?
साथ ही सवाल ये भी है कि सेना में अफ़सरों की कमी की वजह से ग्राउंड पर तैनात सैन्य अधिकारियों में काम का कितना अतिरिक्त दबाव है? सेना के परिचालन में यह कितनी बड़ी चुनौती है? और किन वजहों से भारतीय सेना में अफ़सरों की कमी को पूरा नहीं किया जा सका है?
इन सवालों के जवाब जानने के लिए हमने 1971 से लेकर 90 के दशक तक भारतीय फ़ौज की कई महत्वपूर्ण सैन्य कार्रवाईयों का नेतृत्व करने वाले पूर्व लेफ़्टिनेंट जनरल शंकर प्रसाद और सैन्य रणनीति के जानकार-वरिष्ठ पत्रकार अजय शुक्ला से बात की. पढ़ें इन दोनों जानकारों का नज़रिया:
सेना के तीनों अंगों को मिलाकर भारत के पास क़रीब 14 लाख सैनिक हैं जो मुख्यत: उत्तर-पश्चिम में पाकिस्तान और पूर्वोत्तर में चीन से लगे बॉर्डर पर तैनात हैं.
फ़ौज में अफ़सरों की कमी की जो बात है, उस पर अब नहीं, बल्कि एक दशक से अधिक समय से चर्चा हो रही है.
ये कमी जूनियर अफ़सरों के स्तर पर है, जैसे लेफ़्टिनेंट, कैप्टन और मेजर. यही वो पद हैं जो भारतीय फ़ौज में 'फ़्रंट लाइन' की ताक़त कहे जाते हैं और किसी भी युद्ध के दौरान मोर्चा संभालते हैं.
ये वे अफ़सर होते हैं जो मैदाने-जंग में प्लाटून या कंपनी को लीड करते हैं. ये ना हों तो बड़े सैन्य अधिकारियों को जेसीओ रैंक के अफ़सरों को कमान सौंपनी पड़ती है जिसके उतने बढ़िया नतीजे नहीं निकलते.
अब बात अफ़सरों की कमी से होने वाले असर की, तो मानिए एक बटालियन में 20 अफ़सर अधिकृत हैं और सर्विस में सिर्फ़ 13 या 15 अफ़सर रह जाते हैं तो उन्हें काम 20 अफ़सरों का ही करना होता है.
उदाहरण के लिए, कश्मीर, सियाचीन और पूर्वोत्तर भारत के तनावपूर्ण इलाक़ों में एक सैन्य अफ़सर के बिना रात की पेट्रोलिंग नहीं होती. नियम है कि उसे एक अफ़सर ही लीड करेगा. अब उसे एक ऐसे अफ़सर की ड्यूटी भी करनी है जो उनकी बटालियन में कम है.
तो इस अतिरिक्त काम का असर ये होता है कि एक अफ़सर जो 30 दिन में से पंद्रह दिन रात को अपने बिस्तर पर सो सकता था, वो सिर्फ़ सात या दस दिन ही सो पाता है. इससे उन पर मानसिक और शारीरिक तनाव पड़ता है.
सेना प्रमुख ने यह बिल्कुल सही कहा कि अफ़सर के चयन का स्टैंडर्ड नहीं घटा सकते.
सेना से जुड़ा कोई भी शख़्स इस बात से सहमत होगा कि अगर चयन का मानदण्ड गिराया गया तो निचले स्तर पर सेना का नेतृत्व बहुत कमज़ोर हो जाएगा और उसके फ़ैसलों से सेना की बदनामी होगी, देश की बदनामी होगी.
इसलिए बेहतरीन लोगों को चुनने के लिए अगर ये कमी बनी भी रहे, तो चिंता की बात नहीं है. पर क्या अच्छे लोगों की कमी है? ऐसा बिल्कुल नहीं है. देश में बहुत शार्प लड़के हैं जो फ़ौज के लिए परफ़ेक्ट हैं.
असल बात ये है कि जो अच्छे लड़के हैं, वो फ़ौज में आना ही नहीं चाह रहे. वे आईआईएम में जा रहे हैं, अन्य प्रोफ़ेशनल कोर्स कर रहे हैं. और इसकी कुछ वजहें हैं.
सबसे बड़ी वजह है कि फ़ौज की नौकरी में शारीरिक परिश्रम बहुत है. दूसरी बड़ी वजह ये है कि फ़ौज की नौकरी से जुड़ा स्टेटस दिन प्रतिदिन कम हो रहा है, सुविधाएं और सैलरी कम रह गई हैं.
फ़ौज के लोग 25 साल से चिल्ला रहे हैं कि पे-कमिशन में सशस्त्र बलों का भी एक एक्टिव सदस्य होना चाहिए, लेकिन वे रखते ही नहीं हैं.
क्लास-वन सेवाओं में सबसे कम वेतन पाने वाली नौकरी आर्मी की है. प्रमोशन होने की संभावनाएं फ़ौज में सबसे कम होती हैं क्योंकि हमारे पदों का ढाँचा बड़ा अलग है.
सिविल सर्विस में तक़रीबन सभी जॉइंट सेक्रेट्री या एडिश्नल सेक्रेट्री तो कम से कम बन ही जाते हैं. पर आर्मी में 80-90 परसेंट लोग मेजर या लेफ़्टिनेंट कर्नल के पद तक पहुँचकर ही रिटायर हो जाते हैं.
भारत में अगर क्लास-ए की 10-12 सेवाएं हैं, तो सेना में अफ़सर होना उनमें सबसे अंत में आता है.
भौतिकतावादी ज़माना है, बच्चे बहुत होशियार हो गए हैं, सब यह देखते हैं कि इतनी मेहनत और वक़्त देने के बदले उन्हें क्या मिलेगा?
पहले 80-90 फ़ीसद बच्चे, जो एनडीए जाते थे, वे अच्छे पब्लिक स्कूलों से होते थे. पर अब वो बात नहीं रही.
आज़ाद भारत में, जब तक ब्रिटिश शासन था, फ़ौज के अफ़सर को आईसीएस (इंडियन सिविल सर्विस) वालों से 10 फ़ीसद अधिक पैसा मिलता था. तब बड़े-बड़े लोग फ़ौज में जाते थे.
Monday, December 9, 2019
एयरटेल: बग की वजह से ख़तरे में थीं ग्राहकों की निजी जानकारियां- BBC Exclusive
भारत के तीसरे सबसे बड़े मोबाइल नेटवर्क एयरटेल में एक बग पाया गया जो इसके 30 करोड़ से अधिक यूजर्स के पर्सनल डेटा को ख़तरे में डाल सकता था.
यह तकनीकी खामी एयरटेल के मोबाइल ऐप के ऐप्लिकेशन प्रोग्राम इंटरफ़ेस (एपीआई) में पाई गई थी. इसके ज़रिये हैकर्स नंबरों के माध्यम से ही ग्राहकों की जानकारियां हासिल कर सकते थे.
इन जानकारियों में नाम, जन्मतिथि, ईमेल, पता, सब्स्क्रिप्शन संबंधित सूचनाएं और आईएमईआई नंबर जैसी चीज़ें शामिल थीं.
बीबीसी ने एयरटेल को इस बग के बारे में जानकारी दी जिसके बाद कंपनी ने इसे ठीक कर दिया.
एयरटेल के एक प्रवक्ता ने बीबीसी को बताया, "हमारे एक टेस्टिंग एपीआई में तकनीकी समस्या थी. जैसे ही ये बात हमारे ध्यान में लाई गई, हमने इसे ठीक कर दिया."
प्रवक्ता ने बताया, "एयरटेल का डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म अत्यधिक सुरक्षित है. ग्राहक की गोपनीयता हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है और हम अपने डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सबसे बेहतर इंतज़ाम करते हैं."
इस बग का पता स्वतंत्र सिक्यॉरिटी रिसर्चर एहराज़ अहमद ने लगाया था. उन्होंने बीबीसी को बताया, "मुझे इस खामी का पता लगाने में सिर्फ़ 15 मिनट लगे."
ऊपर बताई गई जानकारियों के अलावा उपभोक्ताओं के आईएमईआई नंबर का भी पता लगाया जा सकता था. आईएमईआई नंबर हर मोबाइल डिवाइस के लिए निर्धारित एक विशिष्ट नंबर होता है.
भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) की रिपोर्ट के अनुसार, 2019 के अंत तक एयरटेल के करीब 32 करोड़ 50 लाख उपभोक्ता थे. वोडाफोन-आइडिया (37 करोड़ 20 लाख) और रिलायंस जियो (35 करोड़ 50 लाख) के बाद ग्राहकों के मामले में एयरटेल तीसरी बड़ी कंपनी है.
इस साल अक्टूबर में जस्ट डायल नाम की लोकल सर्च सर्विस ने अपने एपीआई में खामी का पता लगाया था. इस खामी के कारण भारत में उसके 15 करोड़ 60 लाख उपयोगकर्ताओं प्रभावित हो सकते थे.
जस्ट डायल ने स्वीकार किया था कि इस बग के कारण एक विशेषज्ञ हैकर कुछ जानकारियों का एक्सेस प्राप्त कर सकता था.
हालांकि, यूरोपियन यूनियन के जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन (जीडीपीआर) की तर्ज पर सरकार ने 2018 में निजी डेटा सुरक्षा कानून का एक मसौदा पेश तैयार किया था जिसे पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल के नाम से जाना जाता है.
इस प्रस्तावित कानून में डेटा इकट्ठा करने, प्रोसस करने और स्टोर करने के लिए नियम सुझाए गए हैं जिनमें दंड और मुआवज़े का प्रावधान रखा गया है.
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता वाली केंद्रीय कैबिनेट ने चार दिसंबर को निजी डेटा संरक्षण विधेयक को मंजूरी दी है.
केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने बुधवार को कैबिनेट की एक बैठक के बाद संवाददाता सम्मेलन में बताया, "बिल के बारे में अधिक जानकारी नहीं दे पाऊंगा क्योंकि इसे जल्द ही संसद में पेश किया जाएगा."
यह तकनीकी खामी एयरटेल के मोबाइल ऐप के ऐप्लिकेशन प्रोग्राम इंटरफ़ेस (एपीआई) में पाई गई थी. इसके ज़रिये हैकर्स नंबरों के माध्यम से ही ग्राहकों की जानकारियां हासिल कर सकते थे.
इन जानकारियों में नाम, जन्मतिथि, ईमेल, पता, सब्स्क्रिप्शन संबंधित सूचनाएं और आईएमईआई नंबर जैसी चीज़ें शामिल थीं.
बीबीसी ने एयरटेल को इस बग के बारे में जानकारी दी जिसके बाद कंपनी ने इसे ठीक कर दिया.
एयरटेल के एक प्रवक्ता ने बीबीसी को बताया, "हमारे एक टेस्टिंग एपीआई में तकनीकी समस्या थी. जैसे ही ये बात हमारे ध्यान में लाई गई, हमने इसे ठीक कर दिया."
प्रवक्ता ने बताया, "एयरटेल का डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म अत्यधिक सुरक्षित है. ग्राहक की गोपनीयता हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है और हम अपने डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सबसे बेहतर इंतज़ाम करते हैं."
इस बग का पता स्वतंत्र सिक्यॉरिटी रिसर्चर एहराज़ अहमद ने लगाया था. उन्होंने बीबीसी को बताया, "मुझे इस खामी का पता लगाने में सिर्फ़ 15 मिनट लगे."
ऊपर बताई गई जानकारियों के अलावा उपभोक्ताओं के आईएमईआई नंबर का भी पता लगाया जा सकता था. आईएमईआई नंबर हर मोबाइल डिवाइस के लिए निर्धारित एक विशिष्ट नंबर होता है.
भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) की रिपोर्ट के अनुसार, 2019 के अंत तक एयरटेल के करीब 32 करोड़ 50 लाख उपभोक्ता थे. वोडाफोन-आइडिया (37 करोड़ 20 लाख) और रिलायंस जियो (35 करोड़ 50 लाख) के बाद ग्राहकों के मामले में एयरटेल तीसरी बड़ी कंपनी है.
इस साल अक्टूबर में जस्ट डायल नाम की लोकल सर्च सर्विस ने अपने एपीआई में खामी का पता लगाया था. इस खामी के कारण भारत में उसके 15 करोड़ 60 लाख उपयोगकर्ताओं प्रभावित हो सकते थे.
जस्ट डायल ने स्वीकार किया था कि इस बग के कारण एक विशेषज्ञ हैकर कुछ जानकारियों का एक्सेस प्राप्त कर सकता था.
हालांकि, यूरोपियन यूनियन के जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन (जीडीपीआर) की तर्ज पर सरकार ने 2018 में निजी डेटा सुरक्षा कानून का एक मसौदा पेश तैयार किया था जिसे पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल के नाम से जाना जाता है.
इस प्रस्तावित कानून में डेटा इकट्ठा करने, प्रोसस करने और स्टोर करने के लिए नियम सुझाए गए हैं जिनमें दंड और मुआवज़े का प्रावधान रखा गया है.
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता वाली केंद्रीय कैबिनेट ने चार दिसंबर को निजी डेटा संरक्षण विधेयक को मंजूरी दी है.
केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने बुधवार को कैबिनेट की एक बैठक के बाद संवाददाता सम्मेलन में बताया, "बिल के बारे में अधिक जानकारी नहीं दे पाऊंगा क्योंकि इसे जल्द ही संसद में पेश किया जाएगा."
Monday, November 11, 2019
قصة شابة ساعدها حب الطبيعة في تهدئة مخاوفها
على الرغم من أن جزر فارن نائية، إلا أنها ليست هادئة على الإطلاق. ففي أشهر الصيف، تستقبل هذه المجموعة من الصخور، بمحاذاة الساحل الشمالي لإنجلترا، آلاف الطيور البحرية، منها طيور البفن التي قد تلمحها تطير مسرعة فوق رأسك وهي تملأ مناقيرها ببعض الأسماك.
وفي الكنيسة القديمة، يتنافس حماة الجزيرة مع طيور السنونو، التي تعشش بين العوارض الخشبية، من أجل جذب انتباه الحاضرين. وهذا يذكرنا بأن الطبيعة أحيانا قد تكون فوضوية أكثر مما تكون هادئة.
وعندما زارنا أصدقاؤنا في الشمال هذا الصيف، دهشوا حين رأوا الطيور تغطي كل صخرة في جزر فارن وكل شبر في السماء، واستغرقنا في تأمل الطبيعة وعجائبها حتى فقدنا أثر بعضنا بعضا وفقدنا الشعور بالوقت.
ومنذ أن انتقلت مع صديقي إلى الشمال العام الماضي، اكتشفت أن الطبيعة زاخرة بمظاهر الحياة. وقبلها كنت أعيش في المدن الكبري حيث كنت أعمل كاتبة في مجلات عن تغير المناخ، لكن كل ما كان يشغلني آنذاك هو السياسة الدولية.
وقد اخترت هذا المسار المهني بدافع القلق من تداعيات زيادة انبعاثات الغازات الدفيئة على المدى الطويل، وزيادة حجم المخاطر التي يواجهها فقراء العالم، ومخاطر الأمن الغذائي وانحسار الغطاء الجليدي.
لكنني شعرت آنذاك أنني بعيدة عن هذه التداعيات الجسيمة بحكم معيشتي في دولة غنية وانتمائي للطبقة المتوسطة. إذ لم ألمس بنفسي مظاهر الفقر وتدهور البيئة في حياتي اليومية.
غير أن الانتقال إلى الشمال ساعدني على إعادة الارتباط بالطبيعة، فكنت أشغل وقت فراغي بالبحث عن بوم الحظائر وطيور الرفراف وزهور الأوركيد وغيرها من الفصائل والأنواع الطبيعية. لكن عندما اقتربت من الريف والطبيعة، بدا حجم الدمار الذي حل بالبيئة واضحا.
وبينما كنت أشعر بالسعادة بالارتماء في أحضان الطبيعة، فإن مشاهدة حجم الخسائر البيئية الناجمة عن الأنشطة البشرية كان يؤلمني بشدة، وأدركت أن العالم يواجه أزمة.
وبعد أسابيع قليلة من رحلتنا إلى جزر فارن، اكتشفت أن الأمطار الغزيرة في يونيو/حزيران أدت إلى نفوق المئات من فرخ البفن الضعيفة. وأصدرت مؤسسة التراث القومي، التي تتولى إدارة الجزر، تحذيرا عن الآثار المحتملة لأزمة المناخ على أعداد الطيور. وأصابني هذا الخبر بالحزن الشديد طوال اليوم.
لكن هذا الشعور بالسعادة الغامرة الذي يعقبه حزن شديد قد يتعارض مع نتائج الدراسات عن فوائد الاتصال بالطبيعة، إذ أثبتت دراسات أن قضاء وقت أطول في أحضان الطبيعة كفيل بأن يجعلنا أكثر سعادة. وأشارت دراسة حديثة إلى أن الاستمتاع بالطبيعة والاستماع لتغريد الطيور، قد يساعد في تحسين حياتنا بشكل عام.
ومنذ أن طغت مظاهر التمدن والتحضر على حياتنا، انقطعت صلتنا بالبيئة الطبيعية، وأصبحنا أكثر ارتباطا بالأجهزة التكنولوجية ولم نعد نشعر بتغير الفصول. ولهذا تساءلت ما إن كان البقاء في الطبيعة يجعلنا أكثر وعيا بتدهور البيئة، وما إن كان يفاقم مشاعر القلق على البيئة الذي يعتري الكثيرين اليوم. ولماذا يشعرنا البقاء في الطبيعة بالسعادة المشوبة بالحزن؟
ويقول مايلز ريتشاردسون، رئيس قسم علم النفس بجامعة ديربي والذي ويقود الفريق البحثي عن آثار الارتباط بالطبيعة: "كلما زاد ارتباطك بالطبيعة، زادت مخاوفك حيال التغيرات البيئية. وهذا الخوف من الطبيعي أن يؤثر على الحالة النفسية لأن وضع البيئة أصبح حرجا وقد يترتب عليه تبعات جسيمة".
ولا تزال الأبحاث التي تربط بين الارتباط بالطبيعة والخوف على البيئة وتردي الصحة النفسية في مراحلها المبكرة، لكن كارولين هيكمان، التي تجري أبحاثا عن تغير المناخ وعلم النفس بجامعة باث، تقول إن قضاء وقت في أحضان الطبيعة قد يزيد مشاعر القلق حيال البيئة، لكنه أيضا قد يحسن حالتنا المزاجية ويشجعنا على إتخاذ خطوات لإنقاذ البيئة.
وفي الكنيسة القديمة، يتنافس حماة الجزيرة مع طيور السنونو، التي تعشش بين العوارض الخشبية، من أجل جذب انتباه الحاضرين. وهذا يذكرنا بأن الطبيعة أحيانا قد تكون فوضوية أكثر مما تكون هادئة.
وعندما زارنا أصدقاؤنا في الشمال هذا الصيف، دهشوا حين رأوا الطيور تغطي كل صخرة في جزر فارن وكل شبر في السماء، واستغرقنا في تأمل الطبيعة وعجائبها حتى فقدنا أثر بعضنا بعضا وفقدنا الشعور بالوقت.
ومنذ أن انتقلت مع صديقي إلى الشمال العام الماضي، اكتشفت أن الطبيعة زاخرة بمظاهر الحياة. وقبلها كنت أعيش في المدن الكبري حيث كنت أعمل كاتبة في مجلات عن تغير المناخ، لكن كل ما كان يشغلني آنذاك هو السياسة الدولية.
وقد اخترت هذا المسار المهني بدافع القلق من تداعيات زيادة انبعاثات الغازات الدفيئة على المدى الطويل، وزيادة حجم المخاطر التي يواجهها فقراء العالم، ومخاطر الأمن الغذائي وانحسار الغطاء الجليدي.
لكنني شعرت آنذاك أنني بعيدة عن هذه التداعيات الجسيمة بحكم معيشتي في دولة غنية وانتمائي للطبقة المتوسطة. إذ لم ألمس بنفسي مظاهر الفقر وتدهور البيئة في حياتي اليومية.
غير أن الانتقال إلى الشمال ساعدني على إعادة الارتباط بالطبيعة، فكنت أشغل وقت فراغي بالبحث عن بوم الحظائر وطيور الرفراف وزهور الأوركيد وغيرها من الفصائل والأنواع الطبيعية. لكن عندما اقتربت من الريف والطبيعة، بدا حجم الدمار الذي حل بالبيئة واضحا.
وبينما كنت أشعر بالسعادة بالارتماء في أحضان الطبيعة، فإن مشاهدة حجم الخسائر البيئية الناجمة عن الأنشطة البشرية كان يؤلمني بشدة، وأدركت أن العالم يواجه أزمة.
وبعد أسابيع قليلة من رحلتنا إلى جزر فارن، اكتشفت أن الأمطار الغزيرة في يونيو/حزيران أدت إلى نفوق المئات من فرخ البفن الضعيفة. وأصدرت مؤسسة التراث القومي، التي تتولى إدارة الجزر، تحذيرا عن الآثار المحتملة لأزمة المناخ على أعداد الطيور. وأصابني هذا الخبر بالحزن الشديد طوال اليوم.
لكن هذا الشعور بالسعادة الغامرة الذي يعقبه حزن شديد قد يتعارض مع نتائج الدراسات عن فوائد الاتصال بالطبيعة، إذ أثبتت دراسات أن قضاء وقت أطول في أحضان الطبيعة كفيل بأن يجعلنا أكثر سعادة. وأشارت دراسة حديثة إلى أن الاستمتاع بالطبيعة والاستماع لتغريد الطيور، قد يساعد في تحسين حياتنا بشكل عام.
ومنذ أن طغت مظاهر التمدن والتحضر على حياتنا، انقطعت صلتنا بالبيئة الطبيعية، وأصبحنا أكثر ارتباطا بالأجهزة التكنولوجية ولم نعد نشعر بتغير الفصول. ولهذا تساءلت ما إن كان البقاء في الطبيعة يجعلنا أكثر وعيا بتدهور البيئة، وما إن كان يفاقم مشاعر القلق على البيئة الذي يعتري الكثيرين اليوم. ولماذا يشعرنا البقاء في الطبيعة بالسعادة المشوبة بالحزن؟
ويقول مايلز ريتشاردسون، رئيس قسم علم النفس بجامعة ديربي والذي ويقود الفريق البحثي عن آثار الارتباط بالطبيعة: "كلما زاد ارتباطك بالطبيعة، زادت مخاوفك حيال التغيرات البيئية. وهذا الخوف من الطبيعي أن يؤثر على الحالة النفسية لأن وضع البيئة أصبح حرجا وقد يترتب عليه تبعات جسيمة".
ولا تزال الأبحاث التي تربط بين الارتباط بالطبيعة والخوف على البيئة وتردي الصحة النفسية في مراحلها المبكرة، لكن كارولين هيكمان، التي تجري أبحاثا عن تغير المناخ وعلم النفس بجامعة باث، تقول إن قضاء وقت في أحضان الطبيعة قد يزيد مشاعر القلق حيال البيئة، لكنه أيضا قد يحسن حالتنا المزاجية ويشجعنا على إتخاذ خطوات لإنقاذ البيئة.
Wednesday, September 18, 2019
Führende Scientologen gehören zu den aktivsten Immobilienplayern der Stadt
Ein Firmengeflecht rund um die Swiss Immo Trust AG in Kaiseraugst war massgeblich an der Finanzierung der Scientology-Zentrale am Rande Basels beteiligt. Recherchen der TagesWoche zeigten, wie führende Personen in diesen Firmen mit ihren namhaften Spenden einen Grossteil des Sektentempels an der Burgfelderstrasse finanzierten.
Doch nicht nur innerhalb des Basler Ablegers von Scientology ist dieses Unternehmen eine relevante Grösse. Wie unsere Datenauswertung zeigt, gehört die Swiss Immo Trust zu den wichtigsten Akteuren im Geschäft der Umwandlung von Mietwohnungen in Stockwerkeigentum.
Die TagesWoche hat die im Kantonsblatt publizierten Handänderungen auf dem Basler Immobilienmarkt seit Mitte 2008 ausgewertet. Eine solche Transaktion beschreibt den Verkauf einer Immobilie. Naturgemäss geschieht dies bei der Umwandlung in Stockwerkeigentum in relativ kurzer Zeit gleich mehrfach. Ein Unternehmen kauft eine Liegenschaft auf, renoviert oder baut neu und bringt die Wohnungen daraufhin einzeln auf den Markt. Statt einem einzelnen Eigentümer gibt es nun viele verschiedene.
Umstrittenes Business
Dieses Business gilt deshalb als umstritten, weil dadurch sehr oft günstiger Wohnraum verloren geht. Bevor die Umwandlung in Wohneigentum möglich ist, müssen die bisherigen Mieter nämlich weichen.
Zwischen 2010 und 2014 war die Swiss Immo Trust an über 50 solcher Handänderungen beteiligt. Bei 43 davon ging es um Stockwerkeigentum, verteilt auf insgesamt fünf Bauprojekte. Die Liegenschaften befinden sich allesamt im Gebiet zwischen Schützenmatt- und Kannenfeldpark. Bei all diesen Projekten immer mit dabei: Rudolf Flösser, leitender Direktor von Scientology Basel.
Grösstes Projekt war die Überbauung zwischen der Türkheimerstrasse und dem Spalenring. Dort kaufte die Swiss Immo Trust zwei ältere Liegenschaften auf, um sie durch einen Neubau mit 21 Eigentumswohnungen zu ersetzen.
Das Projekt an der Türkheimerstrasse wurde von der
BW-Liegenschaftsverwaltung geleitet, die sich ebenfalls in den Händen einer Scientologin befindet.
Dies Leitung dieses Projekts oblag der BW-Liegenschaftsverwaltung GmbH, einer Firma von Brigitte Widmer – Scientologin und potente Spenderin für den Bau der Sektenzentrale. Die Wohnungen waren zuvor sehr günstig, eine 3-Zimmer-Wohnung kostete weniger als 1000 Franken.
Das Geschäft ging nicht reibungslos über die Bühne, weil sich einige der verbliebenen Mieter gegen ihre Kündigungen wehrten. Darunter zwei Gewerbler, eine Druckerei und ein Malergeschäft. Diese suchten Hilfe beim Mieterverband und erhoben Einsprache.
Eine erste Kündigung, ausgesprochen durch die Firma BW-Immobilientreuhand, ebenfalls aus dem Umkreis der Scientology, erfolgte zur Unzeit und wurde deshalb für ungültig erklärt. Das Bauprojekt in seiner ersten Version (hauptsächlich 1- und 2-Zimmer-Wohnungen) hielt der gerichtlichen Prüfung ebenso wenig stand und wurde für untauglich befunden. Die Mieter durften ein Jahr länger bleiben.
Nachträgliche Kosten
Unangenehm aufgefallen ist die Swiss Immo Trust auch auf dem Land. 2008 berichtete etwa der «Blick» von einer Überbauung in Therwil. Dort wurde sämtlichen 28 Mietparteien wegen Sanierungsbedarf gekündigt – ihre Wohnungen wurden danach während der Euro 08 aber für mehr als 400 Franken pro Tag an Fussballfans zwischenvermietet.
In einem anderen Fall in Oberwil kam es zwischen dem Unternehmen und
26 Käuferparteien von Eigentumswohnungen zu einem Streit wegen einer Rechnung von 600’000 Franken. Die Swiss Immo Trust wollte diese Anschlussgebühr für Wasser und Kanalisation nachträglich auf die Käufer überwälzen.
Diese gingen jedoch davon aus, dass diese Gebühren bereits im Kaufpreis enthalten gewesen waren. Erst nachdem wiederum die BaZ recherchiert hatte, zeigte sich die Swiss Immo Trust einsichtig und verzichtete auf die Forderung.
Doch nicht nur innerhalb des Basler Ablegers von Scientology ist dieses Unternehmen eine relevante Grösse. Wie unsere Datenauswertung zeigt, gehört die Swiss Immo Trust zu den wichtigsten Akteuren im Geschäft der Umwandlung von Mietwohnungen in Stockwerkeigentum.
Die TagesWoche hat die im Kantonsblatt publizierten Handänderungen auf dem Basler Immobilienmarkt seit Mitte 2008 ausgewertet. Eine solche Transaktion beschreibt den Verkauf einer Immobilie. Naturgemäss geschieht dies bei der Umwandlung in Stockwerkeigentum in relativ kurzer Zeit gleich mehrfach. Ein Unternehmen kauft eine Liegenschaft auf, renoviert oder baut neu und bringt die Wohnungen daraufhin einzeln auf den Markt. Statt einem einzelnen Eigentümer gibt es nun viele verschiedene.
Umstrittenes Business
Dieses Business gilt deshalb als umstritten, weil dadurch sehr oft günstiger Wohnraum verloren geht. Bevor die Umwandlung in Wohneigentum möglich ist, müssen die bisherigen Mieter nämlich weichen.
Zwischen 2010 und 2014 war die Swiss Immo Trust an über 50 solcher Handänderungen beteiligt. Bei 43 davon ging es um Stockwerkeigentum, verteilt auf insgesamt fünf Bauprojekte. Die Liegenschaften befinden sich allesamt im Gebiet zwischen Schützenmatt- und Kannenfeldpark. Bei all diesen Projekten immer mit dabei: Rudolf Flösser, leitender Direktor von Scientology Basel.
Grösstes Projekt war die Überbauung zwischen der Türkheimerstrasse und dem Spalenring. Dort kaufte die Swiss Immo Trust zwei ältere Liegenschaften auf, um sie durch einen Neubau mit 21 Eigentumswohnungen zu ersetzen.
Das Projekt an der Türkheimerstrasse wurde von der
BW-Liegenschaftsverwaltung geleitet, die sich ebenfalls in den Händen einer Scientologin befindet.
Dies Leitung dieses Projekts oblag der BW-Liegenschaftsverwaltung GmbH, einer Firma von Brigitte Widmer – Scientologin und potente Spenderin für den Bau der Sektenzentrale. Die Wohnungen waren zuvor sehr günstig, eine 3-Zimmer-Wohnung kostete weniger als 1000 Franken.
Das Geschäft ging nicht reibungslos über die Bühne, weil sich einige der verbliebenen Mieter gegen ihre Kündigungen wehrten. Darunter zwei Gewerbler, eine Druckerei und ein Malergeschäft. Diese suchten Hilfe beim Mieterverband und erhoben Einsprache.
Eine erste Kündigung, ausgesprochen durch die Firma BW-Immobilientreuhand, ebenfalls aus dem Umkreis der Scientology, erfolgte zur Unzeit und wurde deshalb für ungültig erklärt. Das Bauprojekt in seiner ersten Version (hauptsächlich 1- und 2-Zimmer-Wohnungen) hielt der gerichtlichen Prüfung ebenso wenig stand und wurde für untauglich befunden. Die Mieter durften ein Jahr länger bleiben.
Nachträgliche Kosten
Unangenehm aufgefallen ist die Swiss Immo Trust auch auf dem Land. 2008 berichtete etwa der «Blick» von einer Überbauung in Therwil. Dort wurde sämtlichen 28 Mietparteien wegen Sanierungsbedarf gekündigt – ihre Wohnungen wurden danach während der Euro 08 aber für mehr als 400 Franken pro Tag an Fussballfans zwischenvermietet.
In einem anderen Fall in Oberwil kam es zwischen dem Unternehmen und
26 Käuferparteien von Eigentumswohnungen zu einem Streit wegen einer Rechnung von 600’000 Franken. Die Swiss Immo Trust wollte diese Anschlussgebühr für Wasser und Kanalisation nachträglich auf die Käufer überwälzen.
Diese gingen jedoch davon aus, dass diese Gebühren bereits im Kaufpreis enthalten gewesen waren. Erst nachdem wiederum die BaZ recherchiert hatte, zeigte sich die Swiss Immo Trust einsichtig und verzichtete auf die Forderung.
Tuesday, September 3, 2019
香港抗议:用港英镇暴法律打“反送中” 香港“紧急法”从哪里来?
俗称“反送中”的香港反《逃犯条例》修订案示威处于无解状态。在警民暴力冲突持续,双方武力升级,示威者坚持要政府回应正式撤回修法等五大诉求,北京警告示威出现“恐怖主义”苗头之际,一家香港媒体抛出动用“紧急法”来制止示威的呼吁,引起又一轮辩论。
香港行政长官林郑月娥星期二(8月27日)主持行政会议之前例常会见记者,被问及“是否正在考虑引用紧急法去订立任何政府想立的法例”。林郑月娥说,“到今天为此,特区政府仍然有信心我们可以自己处理这个延续了两个多月的社会纷争”,但除此之外,“也得看看现行法律有没有一些法律手段能够处理得到”。
所谓香港“紧急法”实际上是英治时代订立的法律,如今却被提出来应对北京口中牵涉“外部势力”,“有顏色革命特征”的示威抗议。民主派随即警告此举将带来比出动中国解放军更严重的灾难性后果,亲建制阵营则认为特首应当考虑一切可行办法。
香港时事评论员程翔对BBC中文记者指出,林郑月娥没有及时回应示威者的诉求已经是个错误,引用“紧急法”处理示威浪潮是“更加严重的错误”,她应当正式宣布从立法会撤回《逃犯条例》修订案。
程翔说:“这么一个简单、又完全没有代价的事情不去做,反而去想一些愚蠢100倍、危险1000倍的事情来尝试解决纷争,我觉得这完全不是一个正常人的思路。”
香港《星岛日报》一个专栏最先于星期二发表文章称:“有消息指特区政府觉得让局面恶化下去,最终可能导致警员或示威者出现严重伤亡,甚至搞出人命,有需要以紧急立法形式,加强在法理上对局面控制的根据。”
文章续称:“有消息指,港府经过研判,认为透过现行法例第241章《紧急情况规例条例》进行紧急立法是可行方法。相关法例规定在行政长官会同行政会议认为属紧急情况或危害公安的情况时,行政长官会同行政会议可订立任何他认为合乎公众利益的规例,权力相当广泛。”
《星岛日报》本由祖籍福建的缅甸华人富商胡文虎于1938年创刊,与东南亚多份“星”字为首的华文报纸关系密切。2001年,同属福建籍贯的“烟草大王”何英杰长孙,中国人民政治协商会议常务委员何柱国收购香港星岛集团。香港舆论认为《星岛日报》从当时开始成为亲北京媒体。
引用消息人士交代政府政策并非罕见事情,但香港记者协会过去10年多次批评特区政府的闭门吹风会泛滥,这类吹风会不允许记者作任何形式记录,只许以“消息人士”、“消息来源”等名目报道,一旦报道发表后民意反弹,记者反而得承受遭指责发表假消息的风险。
然而,《星岛日报》近年除了有发表此类“消息人士”报道外,还在某些特别重大事件上得以率先发表官方说法。例如2015年末曝光的铜锣湾书店事件,该报最先报道失踪股东李波与妻子获安排会面之消息,以及李波宣布将放弃英国国籍、专访桂敏海(桂民海)女友声称被骗等。较近期的有独家披露中国前总理李鹏出殡细节。
不过,何柱国本人被认为是前香港政务司司长唐英年的支持者,2012年梁振英与唐英年竞选香港特首时,《星岛日报》被梁振英本人指控专门发表针对他的报道。今年3月,林郑月娥出席《星岛日报》80周年晚宴时,何柱国公开表达对《逃犯条例》修订案之不满。
何柱国在宴会上致辞时说:“(商界朋友)这次来了(《星岛》的晚宴),下次都不知道有没有机会来,可能都被拉进去坐牢也说不定,你们都知道,我们在大陆(经商)总会踩过界、踩地雷,不然哪混到饭吃。”
香港行政长官林郑月娥星期二(8月27日)主持行政会议之前例常会见记者,被问及“是否正在考虑引用紧急法去订立任何政府想立的法例”。林郑月娥说,“到今天为此,特区政府仍然有信心我们可以自己处理这个延续了两个多月的社会纷争”,但除此之外,“也得看看现行法律有没有一些法律手段能够处理得到”。
所谓香港“紧急法”实际上是英治时代订立的法律,如今却被提出来应对北京口中牵涉“外部势力”,“有顏色革命特征”的示威抗议。民主派随即警告此举将带来比出动中国解放军更严重的灾难性后果,亲建制阵营则认为特首应当考虑一切可行办法。
香港时事评论员程翔对BBC中文记者指出,林郑月娥没有及时回应示威者的诉求已经是个错误,引用“紧急法”处理示威浪潮是“更加严重的错误”,她应当正式宣布从立法会撤回《逃犯条例》修订案。
程翔说:“这么一个简单、又完全没有代价的事情不去做,反而去想一些愚蠢100倍、危险1000倍的事情来尝试解决纷争,我觉得这完全不是一个正常人的思路。”
香港《星岛日报》一个专栏最先于星期二发表文章称:“有消息指特区政府觉得让局面恶化下去,最终可能导致警员或示威者出现严重伤亡,甚至搞出人命,有需要以紧急立法形式,加强在法理上对局面控制的根据。”
文章续称:“有消息指,港府经过研判,认为透过现行法例第241章《紧急情况规例条例》进行紧急立法是可行方法。相关法例规定在行政长官会同行政会议认为属紧急情况或危害公安的情况时,行政长官会同行政会议可订立任何他认为合乎公众利益的规例,权力相当广泛。”
《星岛日报》本由祖籍福建的缅甸华人富商胡文虎于1938年创刊,与东南亚多份“星”字为首的华文报纸关系密切。2001年,同属福建籍贯的“烟草大王”何英杰长孙,中国人民政治协商会议常务委员何柱国收购香港星岛集团。香港舆论认为《星岛日报》从当时开始成为亲北京媒体。
引用消息人士交代政府政策并非罕见事情,但香港记者协会过去10年多次批评特区政府的闭门吹风会泛滥,这类吹风会不允许记者作任何形式记录,只许以“消息人士”、“消息来源”等名目报道,一旦报道发表后民意反弹,记者反而得承受遭指责发表假消息的风险。
然而,《星岛日报》近年除了有发表此类“消息人士”报道外,还在某些特别重大事件上得以率先发表官方说法。例如2015年末曝光的铜锣湾书店事件,该报最先报道失踪股东李波与妻子获安排会面之消息,以及李波宣布将放弃英国国籍、专访桂敏海(桂民海)女友声称被骗等。较近期的有独家披露中国前总理李鹏出殡细节。
不过,何柱国本人被认为是前香港政务司司长唐英年的支持者,2012年梁振英与唐英年竞选香港特首时,《星岛日报》被梁振英本人指控专门发表针对他的报道。今年3月,林郑月娥出席《星岛日报》80周年晚宴时,何柱国公开表达对《逃犯条例》修订案之不满。
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